मुक्त विश्वविद्यालय में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर व्याख्यान एवं डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन
प्रयागराज, 7 जुलाई । उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में महान शिक्षाविद्, प्रखर राष्ट्रचिंतक, कुशल राजनीतिज्ञ एवं भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन एवं कृतित्व पर आधारित एक विशेष व्याख्यान एवं वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) प्रदर्शन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने की।
कार्यक्रम के प्रारंभ में 25 मिनट की डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया, जिसमें डॉ. मुखर्जी के जन्म, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शैक्षणिक उपलब्धियों, राजनीतिक जीवन, राष्ट्रहित में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों तथा उनके अंतिम बलिदान तक के संपूर्ण जीवन-वृत्त का प्रभावी चित्रण किया गया। वृत्तचित्र ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों को डॉ. मुखर्जी के विचारों एवं उनके राष्ट्रसमर्पित जीवन से परिचित कराया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे केवल एक महान शिक्षाविद् या कुशल राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रबल प्रहरी थे। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्रहित के लिए समर्पित किया और आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे।0कुलपति ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र सर्वोपरि की भावना के साथ कार्य किया जाए। आज जब भारत वर्ष विकसित भारत-2047 के संकल्प की ओर अग्रसर है, तब प्रत्येक नागरिक, विशेषकर युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता, कर्तव्यनिष्ठा और सकारात्मक सोच के साथ देश के विकास में अपना सक्रिय योगदान दें।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर जो विशेष बल दिया गया है, उसका विचार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वतंत्रता से पूर्व ही प्रस्तुत कर दिया था। उनका स्पष्ट मत था कि अपनी भाषा में शिक्षा ही ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकती है। आज उनकी दूरदर्शी सोच भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा प्रदान कर रही है।
प्रो. सत्यकाम ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का जीवन केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। यदि हम उनके आदर्शों—राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, शिक्षा, संगठन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता—को अपने जीवन में आत्मसात करें, तो एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य निश्चित रूप से साकार होगा।
मुख्य वक्ता प्रो. सत्यपाल तिवारी ने अपने व्याख्यान में कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अल्पायु में ही विधि की शिक्षा प्राप्त कर शिक्षा-जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
कार्यक्रम के संयोजक प्रो. छत्रसाल सिंह ने मंचासीन विद्वतजनों का स्वागत करते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. आनन्दानन्द त्रिपाठी ने तथा डॉ. त्रिविक्रम तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव, वित्त अधिकारी, विभिन्न विद्याशाखाओं के निदेशक, प्रभारी निदेशक, आचार्य, सहायक आचार्य, अधिकारी, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में शोधार्थी उपस्थित रहे।
डॉ प्रभात चंद्र मिश्र
जनसंपर्क अधिकारी
