गुणवत्तापूर्ण जीवन ही सुशासन का वास्तविक स्वरूप - प्रोफेसर सत्यकाम
प्रयागराज, 20 जून ।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज द्वारा केंद्र सरकार के 12 वर्ष सेवा, सुशासन एवं जनकल्याण कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत आयोजित व्याख्यानमाला के सातवें दिन शनिवार को भारतीय सुशासन एवं विकसित भारत–2047 विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया।
व्याख्यान माला के मुख्य अतिथि तथा मुख्य वक्ता भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी कविन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारत की शासन व्यवस्था समय के साथ निरंतर विकसित हुई है। पारंपरिक प्रशासनिक ढाँचे से आगे बढ़ते हुए आज देश तकनीक आधारित, पारदर्शी और उत्तरदायी शासन व्यवस्था की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सुशासन का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराना, विकास को समावेशी बनाना तथा प्रशासन को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाना है।
उन्होंने कहा कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का विकास चरणबद्ध रूप से हुआ है। औपनिवेशिक काल की आई.सी.एस. और आईपी व्यवस्था आज भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के आधुनिक स्वरूप में परिवर्तित हो चुकी है। पंचवर्षीय योजनाओं, हरित क्रांति, आर्थिक सुधारों तथा वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। श्री सिंह ने कहा कि इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी ने शासन प्रणाली को नई दिशा प्रदान की है। सूचना का अधिकार अधिनियम, ई-गवर्नेंस, डिजिटल सेवाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने प्रशासन को जनोन्मुखी बनाया है। आज लाइसेंस, प्रमाण-पत्र, बैंकिंग, प्रवेश प्रक्रिया सहित अनेक सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन उपलब्ध हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल भुगतान, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तथा विभिन्न सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण ने यह सिद्ध कर दिया कि तकनीक आधुनिक शासन का अभिन्न अंग बन चुकी है।
पूर्व आईपीएस अधिकारी श्री सिह ने कहा कि ई-गवर्नेंस के माध्यम से सरकार और नागरिकों के बीच संवाद अधिक प्रभावी हुआ है। शिकायत निवारण प्रणालियों के माध्यम से आम नागरिक अपनी समस्याएँ सीधे प्रशासन तक पहुँचा सकता है। भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार समानता, न्याय और स्वतंत्रता है। केवल आर्थिक प्रगति ही विकास का मानदंड नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और मानव विकास भी विकसित राष्ट्र की पहचान हैं।उन्होंने विकसित भारत–2047 की परिकल्पना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके लिए तकनीक आधारित शासन, नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा मानव संसाधन विकास को विशेष महत्व दिया जा रहा है। स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाएँ देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को नई गति प्रदान कर रही हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि भारतीय चिंतन में शासन का अर्थ केवल सत्ता संचालन नहीं, बल्कि लोकमंगल और सेवा का भाव है। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण जीवन ही वास्तविक सुशासन है। जब शासन की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मानपूर्वक पहुँचता है, तभी सुशासन की अवधारणा सार्थक होती है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत–2047 का स्वप्न केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण है जहाँ प्रत्येक नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध हो। इसके लिए पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, तकनीक का सदुपयोग और नैतिक नेतृत्व अत्यंत आवश्यक हैं।
प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि भारतीय परंपरा में शासन को सदैव जनसेवा का माध्यम माना गया है। ई-गवर्नेंस ने प्रशासन को अधिक पारदर्शी, सुलभ और जवाबदेह बनाया है। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि विकसित भारत के निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी, नवाचार, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
जनसंपर्क अधिकारी डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र ने बताया कि कार्यक्रम का संचालन, स्वागत एवं अतिथियों का अभिनंदन डॉ. सुनील कुमार ने तथा विषय प्रवर्तन एवं मुख्य वक्ता का परिचय व्याख्यानमाला के नोडल अधिकारी प्रोफेसर संजय सिंह ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर आनन्दानंद त्रिपाठी ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। डॉ मिश्र ने बताया कि एक सप्ताह तक चली यह व्याख्यानमाला बहुत लाभदायक सिद्ध हुई। जिससे जनमानस को केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण कार्यों एवं योजनाओं की जानकारी प्राप्त हो सकी।
