अयोध्या की रामकथा में प्रेममूर्ति प्रेमभूषण महाराज बोले,धर्म धारण करने से ईश्वर की निकटता, मृत्यु आदि भय दूर हो जाते हैं
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अयोध्या की रामकथा में प्रेममूर्ति प्रेमभूषण महाराज बोले,धर्म धारण करने से ईश्वर की निकटता, मृत्यु आदि भय दूर हो जाते हैं


मनोज तिवारी ब्यूरो अयोध्या
 प्रसिद्ध वैष्णव पीठ श्रीरामवल्लभाकुंज के रामार्चान मंदिर परिसर में प्रेममूर्ति प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि प्रपंच से अर्जित धन से कोई भी सुखी नहीं हो सकता है सत मार्ग पर चलकर धन अर्जित करने वाले लोग ही शाश्वत सुख की प्राप्ति कर पाते हैं। छल प्रपंच से धर्म तो अर्जित किया जा सकता है लेकिन उसे सुख की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है। जानकी घाट स्थित निर्माणाधीन रामार्चन मंदिर के प्रांगण में रामनवमी के अवसर पर आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के द्वितीय दिन प्रेमभूषण महाराज ने व्यास पीठ से कथा वाचन करते हुए कहा कि अधर्म के पथ पर चलकर धन अर्जित करने वाले जीवन में कभी भी सुखी नहीं हो सकते हैं। दूसरों को वह दूर से सुखी तो दिखते हैं लेकिन वास्तव में वह सुखी होते नहीं है। 
अगर उनके दिल का हाल जाना जाए तो पता चलता है कि उनके दुख की कोई सीमा नहीं है। भारत और पूरी दुनिया के सनातन समाज में अलख जगाने वाले​​​​​​​ प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में पूजा पाठ भजन क्यों आवश्यक है? आपने कहा कि जब मनुष्य धर्म कार्यों में पूजा पाठ में संलग्न हो जाता है तो उसके जीवन से खासकर मृत्यु का भय बिल्कुल समाप्त हो जाता है क्योंकि तब वह धीरे-धीरे ईश्वर के निकट पहुंचने लगता है और जो व्यक्ति भगवान से संबंध स्थापित कर लेता है तो फिर उसे इस संसार की किसी भी चीज से दुख नहीं पहुंचता है।इसीलिए कहा गया है कि जो संत हैं वह दुख या सुख की स्थिति में संभव में ही रहते हैं किसी भी परिस्थिति में उनकी मन की स्थिति नहीं बदलती। आदि पुरूष मनु और माता सतरूपा के जीवन से जुड़े प्रसंग की चर्चा करते हुए प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति में दांपत्य जीवन का सफल निर्वहन करने वाले व्यक्ति के कुल में ही महान आत्माओं का आगमन होता रहा है। जब हम गृहस्थ जीवन में पंच महायज्ञ करते हुए अपने तीन प्रमुख ऋणों से उऋण होने की दिशा में कार्य करते हैं तो हमारे कुल में निरंतर सुख की वृद्धि होती है और वंश परंपराओं में महान आत्माओं का योगदान होता है।भगवान अविकारी हैं और मनुष्य अर्थात जीव विकारों से परिपूर्ण है।भगवान और मनुष्य में यही मूल अंतर है।अपने कर्मों के माध्यम से जीव अगर अपने विकारों से रहित हो जाता है तो वह भगवान के तुल्य होने लगता है। निरंतर सतकर्मों में रहने वाला व्यक्ति ही विकारों से छुटकारा पाता है।

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