प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना नियमित विभागीय कार्रवाई सिपाहियों को सस्पेंड करने के आदेश पर बुधवार को रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव जोशी ने याची सिपाही अतुल कुमार नागर और सुमित शर्मा की याचिकाओं पर पारित किया है। दोनों सिपाहियों ने याचिका दाखिल कर निलंबन आदेश को चुनौती दी थी।
याची सिपाहियों के अधिवक्ता विजय गौतम और अतिप्रिया गौतम ने कोर्ट को बताया कि याचीगण साइबर क्राइम थाना, जनपद गौतमबुधनगर में कार्यरत थे। उनके खिलाफ मंजू चौहान ने थाना फेस-3 में मुकदमा दर्ज कराया। प्रभारी निरीक्षक साइबर क्राइम थाना नोएडा के सेक्टर-36 ने रिपोर्ट भेज कर कहा कि पैसा लेकर आरोपियों को छोड़ने का कृत्य गंभीर और दुराचरण की श्रेणी में आता है। साथ ही पुलिस विभाग की छवि को भी इन्होंने गंभीर क्षति पहुंचाई है।
15 फरवरी, 2021 को सस्पेंड हुए थे आरोपी सिपाही
शिकायतकर्ता के आरोपों के अनुसार, 5 लोग सादे कपड़े में आए। उन्होंने अपने आप को नोएडा साइबर थाने की पुलिस बताया। फिर उसकी कंपनी कार्यालय से वसीम, परवेज और सुहेल को पूछताछ करने के बहाने पकड़कर साथ ले गए। 2 घंटे बाद आरोपियों ने उसके व्हाट्सएप नंबर पर परवेज के व्हाट्सएप नंबर पर कॉल की और तीनों को छोड़ने के बदले 7 लाख रुपए मांगे। बाद में 5 लाख में सौदा तय हो गया। वादिनी का आरोप था कि उसने 2 लाख इन लोगों को दे दिए। बाकी 3 लाख अगले दिन इंतजाम करके देने के लिए कहा। इस पर सिपाहियों ने तीनों आदमियों को छोड़ दिया। पुलिस अधीक्षक साइबर क्राइम यूपी के आदेश पर 15 फरवरी, 2021 को सिपाहियों को सस्पेंड कर दिया गया।
कोर्ट ने सरकारी वकील से 4 सप्ताह में जवाब मांगा
याचियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट विजय गौतम का कहना था कि अपर पुलिस महानिदेशक साइबर क्राइम, लखनऊ के आदेश 2 सितंबर, 2021 के तहत डिप्टी एसपी साइबर क्राइम, लखनऊ को जांच आवंटित की गई। पुलिस उपाधीक्षक साइबर क्राइम ने याचीगणों को अपना अभिकथन जांच में अंकित कराने के लिए 3 सितंबर और 23 नवंबर, 2021 को हाजिर होने को कहा। कहा गया कि निलंबन आदेश बिना किसी ठोस साक्ष्य के पारित किया गया है। न तो सिपाहियों को अभी तक कोई चार्जशीट दी गई है और नहीं नियमित विभागीय कार्रवाई प्रचलित है।
कोर्ट ने निलंबन पर रोक लगाते हुए कहा कि रिकॉर्ड देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि याचीगणों के खिलाफ प्रारंभिक जांच विचाराधीन है। कोर्ट ने कहा कि जब नियमित जांच प्रचलित हो, तभी निलंबित किया जा सकता है। अतः निलंबन आदेश विधि द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने याचिका पर सरकारी वकील से 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।
