प्रयागराज: प्रयागराज मंडल की राजनीति में क्या करवरिया बंधुओं का वर्चस्व टूट गया है? इस सवाल का पहला जवाब हां में हो सकता है। गुरुवार को मतगणना में मेजा विधानसभा क्षेत्र से नीलम करवरिया को जिस तरह पराजय मिली है, उससे यही माना जा रहा है कि करवरिया कुनबे का प्रभाव अब शायद पहले जैसा नहीं रह जाएगा। नीलम करवरिया वर्ष 2017 में मेजा विधानसभा से चुनाव जीती थीं। उनके पति उदयभान करवरिया वर्ष 2007 में 15 वीं विधानसभा के चुनाव में बारा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर चुने गए थे। अगले विधानसभा चुनाव में इस परिवार से कोई नहीं पहुंचा लेकिन उदयभान के भाई कपिल मुनि करवरिया बसपा की टिकट पर वर्ष 2009 में फूलपुर से निवार्चित हुए थे। एक और भाई सूरजभान करवरिया बसपा की टिकट पर एमएलसी मनोनीत हुए थे। करवरिया बंधु नैनी सेंट्रल जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं राजनीति में करवरिया बंधु प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे हैं लेकिन पिछले कुछ समय से जवाहर पंडित हत्याकांड में उम्र कैद की सजा पाकर नैनी सेंट्रल जेल में हैं। ब्राह्मïणों की नाराजगी से बचने के लिए इस बार भी भाजपा ने नीलम को विधानसभा का टिकट ब्राहमण बहुल विधानसभा सीट माने जाने वाली मेजा से उतारा। मतगणना की शुरूआत में उनकी जीत लग रही थी लेकिन बसपा और कांग्रेस के ब्राह्मण प्रत्याशियों ने इतने वोट काट लिए कि सपा की राह आसान हो गई। इस बार नीलम को 75,116 मतदाताओं ने समर्थन दिया लेकिन संदीप 78555 वोट लेकर सफल हो गए। बसपा प्रत्याशी सर्वेश तिवारी ने 22933 वोट झटके और कांग्रेस की शालिनी द्विवेदी ने 1533 मत। पिछले विस चुनाव में इस बार से कम वोट पाने पर भी मिली थी नीलम को जीत
एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि नीलम करवरिया वर्ष 2017 में सिर्फ 67,807 वोट लेकर जीतीं थी लेकिन इस बार अधिक मत मिलने के बाद भी वह चुनाव हार गईं। संभव है कि विधान परिषद के आगामी चुनाव में नीलम करवरिया को भाजपा प्रत्याशी बना दे, लेकिन जिस तरह हार हुई है, उसमें यह आसान नहीं लगता। करवरिया बंधुओं के लिए यह बात और तकलीफदेह होगी कि 18 वीं विधानसभा में उनकी चिर प्रतिद्वंद्वी विजमा यादव बतौर सदस्य बैठेंगी।
