लखनऊ. राजनीति का सबसे बड़ा घराना यादव परिवार हमेशा से ही यूपी की राजनीति का केंद्र रहा है. इसके अलावा समाजवादी पार्टी की पहचान ही परिवार रहा है और इस वजह से विरोधी दल उस पर परिवारवाद का आरोप भी जमकर लगाते रहे हैं. हालांकि अब सपा की मूल पहचान धूमिल होती दिखाई दे रही है. यूं तो परिवार में कलह की खबर समय-समय पर सामने आई हैं, लेकिन बात बिगड़ी तो बनती हुई भी दिखाई दी. इस बार कुछ अलग सा दिख रहा है.यही नहीं, यूपी विधानसभा चुनाव 2022 से पहले मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव का भाजपा से जुड़ना पार्टी को कमजोर कर गया.हालांकि चुनाव के दौरान अखिलेश यादव के चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रमुख शिवपाल सिंह यादव मजबूती से साथ खड़े दिखाई दिए, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद फिर समाजवादी परिवार में दूरियों की शुरुआत होती दिखाई देने लगी. साफ है कि इससे समाजवादी पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है
मिलकर रखी पार्टी की नींव
मुलायम सिंह यादव का छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने हमेशा साथ दिया. यही वजह रही कि यूपी की सियासत में सपा की मजबूती हमेशा से कायम रही. 90 के दशक में शिवपाल इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने, लेकिन असल राजनीति की शुरुआत तो को-ऑपरेटिव से हुई. दरअसल जो काम अमित शाह ने गुजरात में बीजेपी के लिए किया, कुछ उसी तरह से शिवपाल ने को-ऑपरेटिव के जरिए यूपी के सभी जिलों में समाजवादी पार्टी की नींव मजबूत की. इसे बाद वह उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के अध्यक्ष बने. फिर 1996 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे. वहीं, 1997-1998 के बीच विधानसभा में अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़े सदस्य बने. वहीं, एक वक्त वह समाजवादी पार्टी के महासचिव भी बने. इसके अलावा मुलायम सिंह यादव की सरकार में कैबिनेट मंत्री और मायावती सरकार में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभाई. हालांकि उनके लिए यह सब आसान नहीं रहा, लेकिन समाजवादी पार्टी को शीर्ष तक पहुंचाने में शिवपाल यादव का हमेशा से विशेष सहयोग रहा. जबकि उन्होंने पार्टी के लिए अपना पूरा समय दिया और राज्य में पकड़ बनाई. वैसे इस सबके बावजूद पार्टी में उनका वजूद धूमिल होता रहा.
कई बार टूटे, मिलते रहे दल और दिल
समय-समय पर पारिवारिक कलह की खबरें सुर्खियां बटोरती रहीं. कई बार पार्टी से इस्तीफा देने की धमकी तक देनी पड़ी. मुलायम और शिवपाल की उम्र में 16 साल का अंतर है. ऐसे में उम्रदराज होते मुलायम सिंह की जगह उनको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी समझा जाने लगा, लेकिन 2012 में अखिलेश यादव की राजनीति में सक्रियता बढ़ने लगी तो शिवपाल रेस से बाहर हो गए. अखिलेश को तब मुख्यमंत्री बनाया गया था. इसके बाद शिवपाल पार्टी से नाराज भी हुए और कहा था कि जिस बेटे को अपने सामने बड़ा होता देखा वो अब हम सबसे बड़ा हो जायेगा. हालांकि पार्टी के फैसले का मान रखा और अखिलेश को मुख्यमंत्री स्वीकार किया. इस सबके बाद समय समय पर तकरार की तस्वीरें सामने आती रहीं, तो रूठने- मनाने का सिलसिला भी चलता रहा. 2017 के विधानसभा चुनावों के पहले हुए पारिवारिक झगड़े के बाद शिवपाल यादव ने अपना रास्ता अलग करना ही सही समझा और 2018 में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी की बना डाली.एक बार फिर गठबंधन में आई दरार कहते हैं कि रेशम से बांधो या सूत से गांठ पड़े रिश्तों की कमियां नजर आ ही जाती हैं. उस रिश्ते को गठबंधन से जोड़ा भी गया, लेकिन डोर के दोनों सिरे कमजोर पड़ते दिख रहे हैं. सच कहा जाए तो गठबंधन टूटने की कगार पर खड़ा है. 2022 विधानसभा चुनाव के लिए मुलाकात हुई, बात हुई और चुनाव के लिए पक्की सांठगांठ हुई. इसके अलावा मनमुटाव दूर किया गया और प्रसपा-सपा गठबंधन साथ लड़े. इस बार भी चुनाव में पूरे अपनेपन के साथ शिवपाल सिंह यादव अपने भतीजे अखिलेश के साथ खड़े रहे. उनके साथ चुनाव प्रचार भी किया और खुद साइकिल के सिंबल से चुनाव तक लड़ा. हालांकि सालों से पड़ती आ रही रिश्तों में गांठ मौके मौके पर दर्द देती भी दिखाई दी. चाचा की अनदेखी करने पर विपक्ष ने भी खूब सवाल उठाए. अखिलेश पर आरोप लगे कि उन्होंने शिवपाल यादव का उचित सम्मान नहीं किया. जबकि चुनाव का अंत आते आते शिवपाल भी इसको लेकर मुखर होते दिखाई दे रहे हैं. सपा विधायकों की बैठक में बुलावा नहीं जाने पर नाराजगी जताई, तो सहयोगी दलों की बैठक का बहिष्कार करते नजर आये. अब इस बीच उनकी सीएम योगी आदित्यनाथ से शिष्टाचार भेंट के बाद सुर्ख़ियों का बाजार गर्म है. कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या शिवपाल सिंह यादव बीजेपी ज्वॉइन करने वाले हैं. फिलहाल शिवपाल ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध राखी है.

