वाराणसी/लखनऊ. लगता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) काशी पर आकर केंद्रित हो गया है. चुनाव से जुड़े हर नेता ने वहां पहुंचना जरूरी समझा. खास बात यह है कि जो इससे बिल्कुल अलग थे, वह भी वहां से जुड़ने की कोशिश में रहे. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ऐसी ही राजनेता हैं, जो दो दिन काशी में रहकर कोलकाता लौटीं. काशी में इन दिनों अन्य राजनेता भी पहुंचे. वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) का लोकसभा क्षेत्र है. फिर भी उनका वहां होना चर्चा में रहता है. केंद्र सरकार के मुखिया होने के कारण खुद क्षेत्र में उनकी मौजूदगी व्यस्तता वाली होती है. इस बार राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार के लिए वे वहां पहुंचे. वे नहीं चाहते कि पूरे राज्य के मुकाबले उनके लोकसभा क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहे, इसलिए गहमागहमी और बढ़ गयी है.इसके पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी तीन दिनों के लिए काशी में अपना डेरा जमा चुकी थीं. इन नेताओं में से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का काशी दौरा गौर से देखा जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी कहीं नहीं थी. वे अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी गठबंधन के समर्थन के लिए बाबा विश्वनाथ की नगरी पहुंचीं. अखिलेश यादव, रालोद के जयंत चौधरी और गठबंधन के दूसरे नेताओं के साथ दीदी ने चुनावी मंच साझा किया. इस अर्थ में उन्होंने राज्य विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के आखिरी चरण में एक नई जान फूंक दी.
यूपी की राजनीति में ममता बनर्जी के मायने
राज्य में दो प्रमुख गठबंधनों में कहीं भी नहीं दिखाई देने वाली ममता बनर्जी की रुचि आखिर उत्तर प्रदेश में क्यों बढ़ गयी? इस कोशिश में तो उन्हें काले झंडों का भी सामना करना पड़ा. अलग बात है कि उन्होंने इसे राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कथित गुंडों की करतूत बताया. दीदी के इस बयान को भी चुनावी ही समझना चाहिए. फिर सवाल है कि इस चुनाव से उन्हें क्या लाभ हुआ? इस का उत्तर ढूंढने की कोशिश अभी जल्दबाजी लग सकती है, लेकिन उत्तर मिलने शुरू हो चुके हैं. इसे मात्र संयोग कह सकते हैं कि जिस दिन दीदी वारणसी में थीं, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव रांची में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिले. दीदी का वाराणसी और राव का रांची दौरा संयोग हो सकता है, लेकिन दोनों के बयान इससे बिल्कुल अलग हैं. चंद्रशेखर राव ने कहा कि अभी कोई विपक्षी गठबंधन नहीं हो रहा, लेकिन विपक्ष देश को सही दिशा में ले जाना चाहता है. इधर दीदी ने भी कहा कि भाजपा देश को विनाश की ओर ले जा रही है. इसके पहले लखनऊ के दौरे में ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश से भाजपा के सफाए पर केंद्र से भी उसकी विदाई तय है. तो क्या ममता और राव दोनों एक योजना के तहत काम कर रहे हैं.स्पष्ट है कि अभी विपक्षी एकता के लिए कोई बड़ी और समवेत योजना दिख नहीं रही. स्वयं जहां उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए दीदी बनारस पहुंचीं, वहां देश का सबसे बड़ा विपक्षी दल कांग्रेस अकेले ही चुनाव मैदान में है. खुद राव और सोरेन भी ममता की कोशिशों को आगे बढ़ाते नजर आए, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता. अभी तो दीदी भी उत्तर प्रदेश के चुनाव पर ही केंद्रित दिखीं. हालांकि यहीं पर ध्यान देने की जरूरत है कि उनकी कोशिश विपक्षी गठबंधन की ही है. फिर भी दोनों कोशिशों में फर्क है. राव और सोरेन छोटे दलों को एक कर दिल्ली में बड़ी भागीदारी की उम्मीद कर रहे होंगे. इसके विपरीत तीन बार से पश्चिम बंगाल का चुनाव जीत रहीं दीदी की नजर में बड़ा लक्ष्य है. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे शरद पवार से आगे निकलने की कोशिश में हैं. पवार ने जहां सपा के अखिलेश यादव से गठबंधन बनाकर भी उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए प्रचार करना जरूरा नहीं समझा, ममता बनर्जी बिना गठबंधन सपा को समर्थन देने आ पहुंचीं. ऐसे में भविष्य भी पवार-अखिलेश की जगह ममता-अखिलेश की नजदीकियां दिखा सकता है. संभव है कि पवार के स्वास्थ्य के मुकाबले दीदी की सक्रियता उन्हें भविष्य के हसीन सपने दिखा रही हो.क्या 2024 का लोकसभा चुनाव है लक्ष्य?
इन तथ्यों के बीच पते की बात ममता का अभियान काशी से शुरू करने में है. वाराणसी कैंट और वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में लगभग ढाई लाख की संख्या में बंगाली लोगों का होना विश्लेषकों की नजर में हो सकता है. बावजूद इसके बंगाल से आई राजनेता का बाबा विश्वनाथ के साथ कबीर मठ मूलगादी में भी माथा टेकना है. यहां ध्यान में रखना होगा कि मूलगादी से बड़ी संख्या में दलित और अति पिछड़े समुदाय के लोग गहरे जुड़े हैं. इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कबीर मठ जाने का कोई मौका नहीं चूकते. इस बार तो प्रियंका गांधी ने तीन दिनों तक वहीं डेरा डाला. ममता ने कबीर मठ पहुंचकर उत्तर प्रदेश के उन नौ जिलों तक अपना संदेश पहुंचाया, जहां अंतिम चरण में चुनाव होने हैं और इस समुदाय के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं. इससे उन्होंने अखिलेश को फायदा पहुंचाने की कोशिश की है. प्रधानमंत्री मोदी के विशाल और भीड़ भरे रोड शो के मुकाबले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिश कितना रंग भर पायेगी, यह भविष्य बताएगा. फिर भी एक बात स्पष्ट है कि दीदी ने बंगाल के बाहर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू कर दी है और यह कोशिश 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए ही है.
