प्रदीप बच्चन (व्युरो चीफ)
बलिया (उत्तर प्रदेश): कहते हैं अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शारीरिक बाधा मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। इसे सच कर दिखाया है बलिया जिले के मनियर स्थित दिघेड़ा गांव की 7 वर्षीय रागिनी राजभर ने। एक सड़क दुर्घटना में अपना एक पैर गंवाने के बावजूद रागिनी ने पढ़ाई का सपना नहीं छोड़ा। वह रोज 400 मीटर की दूरी एक पैर पर तय करके प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा पहुंचती है।
आर्थिक तंगी और माता-पिता का संघर्ष
कक्षा एक में पढ़ने वाली रागिनी के पिता देवेंद्र राजभर पेशे से मजदूर हैं और मां बबीता गृहणी हैं। सीमित आय के कारण परिवार उसके इलाज या कृत्रिम पैर (Artificial Limb) का खर्च उठाने में असमर्थ रहा। शुरुआत में माता-पिता उसे गोद में उठाकर स्कूल छोड़ते थे, लेकिन मजदूरी पर जाने की वजह से रागिनी की पढ़ाई छूटने लगी थी।
जिद और जज्बे ने दिखाई राह
पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाता देख रागिनी ने खुद ही स्कूल जाने की जिद की। अब वह रास्ते में थकने पर थोड़ी देर सुस्ताती है और फिर हिम्मत जुटाकर स्कूल की तरफ कदम बढ़ा देती है। प्रधानाध्यापक अमित पाल यादव के अनुसार रागिनी का हाल ही में नामांकन हुआ है और उसे विभागीय सुविधाएं दिलाने का प्रयास जारी है।
मनियर के सात साल की रागिनी राजभर के लिए स्कूल जाना महज पढ़ाई का हिस्सा नहीं, बल्कि रोज खुद को साबित करने की चुनौती है। सड़क दुर्घटना में एक पैर गंवाने के बाद भी उसने शिक्षा का सपना नहीं छोड़ा। अब वह एक पैर के सहारे करीब 400 मीटर की दूरी तय कर मनियर के प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा पहुंचती है।
रागिनी कक्षा एक की छात्रा है। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि उसके लिए कृत्रिम पैर या अन्य सहायक उपकरण आसानी से उपलब्ध कराया जा सके। उसके पिता देवेंद्र राजभर मजदूरी करते हैं, जबकि मां बबीता घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं। सीमित आमदनी में परिवार का खर्च चलाना ही मुश्किल है।
परिवार के मुताबिक दुर्घटना के बाद रागिनी का इलाज कराने का काफी प्रयास किया गया, लेकिन उसका पैर ठीक नहीं हो सका। शुरुआत में माता-पिता उसे अकेले स्कूल भेजने से डरते थे। जब भी संभव होता, वे उसे गोद में लेकर विद्यालय पहुंचाते थे। मजदूरी पर जाने के कारण कई बार रागिनी स्कूल नहीं जा पाती थी।
पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाते देखकर रागिनी भी पढ़ने की जिद करती थी। आखिर उसने खुद एक पैर के सहारे स्कूल जाने का फैसला कर लिया। रास्ते में थकान होने पर वह कुछ देर बैठती है और फिर हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ जाती है।
प्रधानाध्यापक अमित पाल यादव ने बताया कि रागिनी का हाल ही में कक्षा एक में पंजीकरण हुआ है। विभागीय स्तर से मिलने वाली सुविधाओं की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
मामला सामने आने के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने रागिनी को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने और प्रतिवर्ष 2000 रुपये छात्रवृत्ति दिलाने का भरोसा दिया है।
रागिनी की कहानी यह सवाल भी खड़ा करती है कि जब एक बच्ची अपनी शारीरिक कठिनाई के बावजूद शिक्षा पाने के लिए संघर्ष कर सकती है, तो क्या व्यवस्था उसके रास्ते को आसान बनाने के लिए समय पर जरूरी संसाधन उपलब्ध करा सकती है?

