सनातन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रवृत्ति- प्रोफेसर दुबे
सनातन का वास्तविक स्वरूप मानव कल्याण में निहित - प्रोफेसर
प्रयागराज, 22 जुलाई, 2026। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज की समाज विज्ञान विद्याशाखा के तत्वावधान में बुधवार को विश्वविद्यालय के सरस्वती परिसर स्थित लोकमान्य तिलक सभागार में भारतीय संस्कृति में सनातन की अवधारणा विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व आचार्य प्रोफेसर हरि नारायण दुबे ने व्याख्यान देते हुए कहा कि सनातन केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि मानवता, समरसता एवं शाश्वत जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में अनेक ईसाई मिशनरियों ने भारतीय सनातन जीवन-पद्धति एवं सांस्कृतिक मूल्यों को विकृत करने का प्रयास किया, जिसका प्रभावी उत्तर महामना मदन मोहन मालवीय ने वर्ष 1933 में प्रारम्भ की गई सनातन धर्म पत्रिका के माध्यम से दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति विश्व कल्याण की भावना पर आधारित है। सनातन सदैव रहने वाला विचार है, जो हमें वैदिक ऋषियों की उस परंपरा की ओर ले जाता है जिसमें धर्म का आधार सत्य, कर्तव्य और लोकमंगल है।
प्रो. दुबे ने कहा कि सनातन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समावेशी प्रवृत्ति है। यह किसी के प्रति वैरभाव नहीं रखता, बल्कि सभी विचारों को आत्मसात करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि महात्मा गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक भारतीय चिंतन की मूल धारा में समरसता, सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव की भावना निरंतर दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि सत्य, शुद्धता और लोककल्याण ही सनातन के मूल तत्व हैं। उन्होंने कहा कि आज समाज संस्कृति से नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता के वास्तविक स्वरूप से दूर होता जा रहा है। संस्कृति को उन्होंने पुष्प की सुगंध तथा सभ्यता को उसकी पंखुड़ियों की उपमा देते हुए कहा कि आधुनिक तकनीकी युग में मोबाइल, टेलीविजन तथा अन्य डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है, अन्यथा वे हमारी सांस्कृतिक चेतना को प्रभावित कर सकते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि सनातन वैदिक चेतना का वह शाश्वत भाव है जो समस्त मानवता को साथ लेकर चलने की प्रेरणा देता है।भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गतिशीलता है। इसमें न तो जड़ता है और न ही संकीर्णता है। यह निरंतर प्रवाहित होने वाली जीवनधारा है, जो प्रत्येक युग में नवीन विचारों को आत्मसात कर स्वयं को समृद्ध करती रही है।
उन्होंने कहा कि मूर्ति-पूजन मानव सभ्यता की एक प्राचीन एवं सार्वभौमिक परंपरा रही है। इतिहास के विभिन्न कालखंडों में विश्व की अनेक सभ्यताओं में इसकी उपस्थिति रही है। यदि सनातन को किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान तक सीमित कर दिया जाए, तो उसके व्यापक मानवीय एवं सांस्कृतिक स्वरूप को समझना कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि सनातन का वास्तविक स्वरूप समावेश, संवाद, सहअस्तित्व और मानव कल्याण में निहित है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में समन्वयक एवं समाज विज्ञान विद्याशाखा के निदेशक प्रोफेसर एस कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। आयोजन सचिव डॉ. सुबास चन्द पाल ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन डॉ सुनील कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ त्रिविक्रम तिवारी ने किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के निदेशकगण, आचार्य, सहायक आचार्य, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र
जनसंपर्क अधिकारी
