प्रयागराज: राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय समावेशी है भारतीय लोक संस्कृति - प्रोफेसर सत्यकाम
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प्रयागराज: राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय समावेशी है भारतीय लोक संस्कृति - प्रोफेसर सत्यकाम



प्रयागराज 28/03/2026: उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के सरस्वती परिसर स्थित लोकमान्य तिलक शास्त्रार्थ सभागार में शनिवार को लोक संस्कृति: परंपरा, पहचान एवं प्रतिमान विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। 

व्याख्यान के मुख्य वक्ता आचार्य सलिल मिश्र, विजिटिंग प्रोफेसर, बी.एम.एल. मुंजाल विश्वविद्यालय, गुरुग्राम, हरियाणा ने लोक संस्कृति के तीन आधार पर प्रकाश डाला। जिसमें भाषाओं और धार्मिक आयाम के द्वारा लोक संस्कृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण विचारों को साझा किया। कहा कि लोक संस्कृति और विचार संस्कृति बहुत अलग होते हुए भी कुछ असमानताएं मिलती हैं। 19वीं सदी में यूरोप में सभ्य और गैर सभ्य समाजों के बीच अंतर किया जाने लगा। भारत और चीन में भाषाई इतिहास के संदर्भ में 12वीं सदी का समय बहुत महत्वपूर्ण है। अमीर खुसरो का संदर्भ लेते हुए भाषाई विविधता को स्पष्ट किया। 

अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि किसी भी राष्ट्र या संस्था का निर्माण व्यक्ति आश्रित होता है। अटल जी की विश्व दृष्टि ने भारत को स्थिर राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अटल जी के काव्य लेखन को राष्ट्र प्रेम से प्रेरित बताया । भारतीय लोक संस्कृति एक समावेशी संस्कृति है। लोक संस्कृति के मुख्य स्रोत भाषायी और धार्मिक आयाम तथा विचार होते हैं । 

व्याख्यान के संयोजक तथा निदेशक, समाज विज्ञान विद्या शाखा प्रोफेसर एस कुमार द्वारा मंचासीन विशिष्ट जनों का वाचिक स्वागत किया गया । सत्र का संचालन सहायक आचार्य सुनील कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर संजय सिंह ने किया। इस व्याख्यान में विश्वविद्यालय के समस्त विद्याशाखाओं के निदेशकगण, आचार्यगण, सहआचार्यगण, सहायक आचार्यगण समस्त शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे। 


डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र

जनसंपर्क अधिकारी

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