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नई दिल्ली. आज, 8 मार्च है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
(International Women’s Day). बताते हैं कि मार्च 1911 में पहली बार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जाने के बारे में विचार किया गया. इसके बाद 8
मार्च 1913 से इसे औपचारिक तौर पर पूरी दुनिया में मनाया भी जाने लगा. और
इसे मनाने का मकसद? इतना कि महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों.
अन्य लोगों में महिलाओं से जुड़े मसलों को लेकर जागरूकता पैदा हो. महिलाओं
को बराबरी का दर्जा मिल सके. लेकिन 100 सालों से लगातार यह आयोजन होने के
बावजूद आज भी सवाल कायम हैं. इनमें एक अहम ये है कि महिलाएं अपने अधिकारों
के प्रति कितनी जागरूक हुई हैं? इसके जवाब में तथ्य ये है कि भारत जैसे
दुनिया के तमाम देशों में आज भी दो-तिहाई से ज्यादा महिलाओं को अपने से
जुड़े कानूनों की भी जानकारी नहीं है. इसी तथ्य के मद्देनजर यहां महिलाओं से
जुड़े कुछ चुनिंदा लेकिन अहम कानूनी इंतजामों पर रोशनी डालने की कोशिश करते
हैं. बस, 5-प्वाइंट में.1. पढ़ने और बाल-विवाह से बचने का हक
जो बच्चे शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत स्कूलों में दाखिला लेते
हैं, उनमें 50% बच्चियों का होना अनिवार्य होता है. इसी तरह बाल विवाह
निषेध अधिनियम- 2006 है. इसमें बच्चों की शादी करना अपराध तो है ही, एक और
अहम प्रावधान है. ये कि अगर माता-पिता बच्ची की शादी छुटपन में कर देते
हैं, वह मान्य नहीं होगी. बेटी बड़ी होने पर चाहे तो दोबारा विवाह कर सकती
है.
2. संपत्ति, तलाक, मां बनने, घरेलू हिंसा जैसे मामले में हक
शादी होने के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर का अधिकार होता है. उस पर विवाह के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता. वह अपने साथी के साथ लिव-इन में रह सकती है. उससे संतान को जन्म दे सकती है. चाहे तो बिना विवाह किए ही संतान को गोद ले सकती है. शादी के लिए ससुराल वाले दहेज मांगते हैं, तो उन्हें 5 साल तक की जेल हो सकती है. शादी के बाद ससुराल वाले बहू पर गर्भ में भ्रूण की जांच (यानी लड़का है या लड़की) के लिए दबाव नहीं बना सकते. ऐसा करने पर ससुराल वालों को 1 लाख रुपये तक जुर्माना और 5 साल की जेल हो सकती है. महिला अगर नौकरी करती है तो बच्चे के जन्म के बाद 3 महीने का अवकाश पूरी तनख्वाह के साथ उसे दिए जाने का बंदोबस्त है. महिला अगर बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती, तो उस पर दबाव नहीं बनाया जा सकता. वह संतान गोद ले सकती है. लिव-इन में रहते हुए या ससुराल में महिला को शारीरिक, मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना दी जाती है, तो वह वकील के बिना भी सीधे अदालत में जा सकती है. घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करा सकती है. पति से विवाद होने या तलाक होने पर भी महिला तब तक ससुराल में रह सकती है, जब तक उसके रहने का बेहतर इंतजाम नहीं हो जाता. पति या लिव-इन पार्टनर से अलग होने पर उनसे गुजारा भत्ता मांग सकती है. पति के न रहने पर ससुराल वालों से गुजारा-भत्ता ले सकती है. पति से विवाद होने पर या उसके न रहने पर भी महिला उसकी संपत्ति में हिस्सा मांग सकती है. हिंदू उत्तराधिकार कानून और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उसे यह अधिकार है. उसकी संतान को भी यह अधिकार है. महिला की इच्छा के बिना उसकी संपत्ति का कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता. बच्चे का स्कूल में दाखिला कराते समय उसके पिता की जगह मां अपना नाम लिखवा सकती है.
3. कामकाज, वेतन, सम्मान और गरिमा से अधिकार
सरकारी नौकरी करने वाले किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसकी पुत्री भी पुत्र की तरह ही अनुकंपा नियुक्ति की अधिकारी है. कार्यस्थल, चाहे निजी हों या सरकारी, महिला की इच्छा के बिना उसे सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों के बराबर ही वेतन दिए जाने का भी कानूनी प्रावधान है. महिलाओं पर अश्लील कमेंट करना, उन्हें परेशान करना, अपमानजनक टिप्पणी या इशारे करना, इजाजत के बिना उनकी तस्वीरों आदि प्रकाशित या प्रसारित करना, सब अपराध है. भारतीय दंड विधान (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत ऐसे आरोपियों पर कार्रवाई की जा सकती है. इस तरह के अपराध अगर मीडिया या सोशल मीडिया के जरिए होते हैं, तो सूचना-तकनीक से जुड़े कानून (IT Act) के तहत दंडात्मक कार्रवाई किए जाने का बंदोबस्त है.
4. बुजुर्ग महिलाओं के लिए भी कानून में पुख्ता इंतजाम
बुजुर्ग महिलाओं की अनदेखी उनकी संतान भी नहीं कर सकती. साधनविहीन माता-पिता अपनी संतान से भरण-पोषण मांगने के अधिकारी होते हैं. संतान अपने माता-पिता की देखभाल और सम्मानपूर्वक उनके भरण-पोषण के लिए कानूनन बाध्य है. भरण-पोषण अधिनियम-1956 और मेंटनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजंस एक्ट-2007 के तहत इस संबंध में प्रावधान हैं.
5. सरकार का फर्ज कि वह महिलाओं की मदद करे
संविधान के तहत सरकार का यह कर्त्तव्य माना गया है कि वह पीड़ित महिलाओं को हरसंभव कानूनी मदद मुहैया कराए. जरूरत पड़ने पर विधिक सेवा प्राधिकरण के जरिए उसके लिए निशुल्क वकील उपलब्ध कराए. अदालत में उसके मामले का अंतिम फैसला आने तक उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे. यह भी बंदोबस्त करे कि पीड़ित महिला पर कोई दबाव न बनाया जा सके. उसके बयानों, सबूतों से किसी तरह की छेड़छाड़ न की जा सके
