प्रयागराज, 05 जून 2026।विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर लिटरेरी क्लब (इलाहाबाद साहित्यिक अड्डा) एवं औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, खुसरोबाग, प्रयागराज के सभागार में "जलवायु परिवर्तन से प्राणी जीवन पर गहराता संकट" विषयक संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का आयोजन सम्पन्न हुआ।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर संयुक्त निदेशक उद्यान डॉ. वीरेंद्र सिंह जी ने पौधारोपण कर कार्यक्रम की शुरुआत की!
कार्यक्रम की अध्यक्षता खुसरोबाग प्रभारी विजय किशोर सिंह ने की तथा मुख्य अतिथि प्रकृति प्रेमी एवं उस्ताद शायर अनवार अब्बास नक़वी रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में विवेक श्रीवास्तव एवं प्रेमा राय उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन दोहाकार डॉ. प्रदीप कुमार चित्रांशी ने किया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अध्यक्ष, मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन तथा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। डॉ. राहुल शुक्ल "साहिल" ने अतिथियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम के अंत में साकिब बादल ने आभार व्यक्त किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विजय किशोर सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं सूखा तो कहीं अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। इन समस्याओं के समाधान हेतु वृक्षों का संरक्षण एवं अधिकाधिक पौधारोपण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए प्रत्येक नागरिक को वृक्षारोपण के साथ-साथ पौधों की देखभाल का भी संकल्प लेना चाहिए।
मुख्य अतिथि अनवार अब्बास नक़वी ने कहा कि भूमि, जल और वायु की सुरक्षा मानव जीवन की सुरक्षा है। प्रदूषण को कम करने तथा धरती की उर्वरता बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता बताया।
डॉ. राहुल शुक्ल "साहिल" ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रकृति का महत्व मानव जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद तक बना रहता है। साहित्य की अधिकांश सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रकृति के इर्द-गिर्द ही विकसित हुई हैं। वैदिक साहित्य की अनेक ऋचाएँ प्रकृति संरक्षण और उसकी उपासना पर केन्द्रित हैं।
विशिष्ट अतिथि विवेक श्रीवास्तव ने पर्यावरण के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि हरियाली मानव जीवन की मूल आवश्यकता है। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों के बीच ऑक्सीजन और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए छोटे-छोटे उपवनों और हरित क्षेत्रों का विकास आवश्यक है।
द्वितीय सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन एवं काव्य गोष्ठी में साहित्यकारों ने प्रकृति संरक्षण, जल-संरक्षण और पर्यावरणीय चेतना पर आधारित अपनी रचनाओं का पाठ किया। डॉ. राहुल शुक्ल "साहिल" ने अपने दोहे में कहा—
"सकल धरा सुन्दर बने, पौधै हो चहुँ ओर।
मिलकर संरक्षण करें, सुखमय होगा भोर।।"
प्रख्यात शायर फरमूद इलाहाबादी ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा—
"बाढ़ आए या कहीं सूखा पड़े, दन दना दन दन कुल्हाड़ी है, तो है।"
संजय सक्सेना ने पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित अपनी रचना प्रस्तुत की। रचना सक्सेना ने आशा, संघर्ष और प्रकृति की सकारात्मक ऊर्जा को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। मुख्य अतिथि अनवार अब्बास नक़वी ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से प्रकृति की मधुर अनुभूतियों को स्वर दिया—
"शब्दों के जब फूल बुलाएँ आ जाना,
बूँदें जब अमृत बरसायें आ जाना।।"
कवयित्री प्रीता बाजपेयी ने जल संरक्षण एवं माँ गंगा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा—
"एक-एक बूंद की खातिर वो किधर जाएंगे,शिद्दतें प्यास से घबरायेंगे, उकतायेंगे।तुमने सोचा है कभी गंगा हमारी माँ है,माँ की सेवा ना करेंगे तो नरक जायेंगे।।"
अमर उजाला के पत्रकार एवं प्रख्यात साहित्यकार ईश्वर शरण शुक्ल जी ने कहा कि
चिलचिलाती धूप तलवे को जलाती,
धूल उड़ कर इन्द्रियों को भी रूलाती।
प्रेमा रॉय जी ने कहा कि
खूब सताया तूने मुझको,
प्रतिफल जिसका भुगत रहा,
पर्यावरण को संजोइए।
कार्यक्रम के संचालक एवं दोहाकार डॉ. प्रदीप कुमार चित्रांशी ने पर्यावरण विनाश पर मार्मिक दोहा प्रस्तुत किया—
"रोकर बोला फालसा, सुन लो अम्मीजान।
मानव ने पहुँचा दिया, खिन्नी को श्मशान।।"
कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों, पर्यावरण प्रेमियों एवं नागरिकों ने एक स्वर से पर्यावरण संरक्षण, जल-संरक्षण तथा अधिकाधिक वृक्षारोपण का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को स्मरण करने और उन्हें व्यवहार में उतारने का अवसर है। यदि आज पर्यावरण की रक्षा के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
अंत में सभी उपस्थित जनों ने "एक पौधा – एक संकल्प" अभियान को सफल बनाने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए निरंतर जन-जागरण चलाने का संकल्प लिया।
