कहते हैं जब अपनी कुर्सी हिलती है, तो दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की गलियां नाप दी जाती हैं, लेकिन जब जनता की जिंदगी दांव पर होती है, तो सिस्टम 'फाइलों की धूल' फांकने का बहाना ढूंढ लेता है। घाघरा घाट पुल, जिसे सात जिलों की लाइफलाइन कहा जाता है, उसे दो महीने के लिए बंद करने की तैयारी है। लेकिन इस बंद के साथ जो सवाल खड़ा हुआ है, वह मरम्मत से ज्यादा नीतिगत लकवा और चुनावी संवेदनहीनता का है।
विदाई का डर या वीआईपी रास्ता?
हैरानी की बात यह है कि जिले के 5 माननीय विधायक मुख्यमंत्री की चौखट पर तब दौड़े, जब खुद के लखनऊ आने-जाने का रास्ता बंद होने की नौबत आई। जनता के बीच दबी जुबान में नहीं, बल्कि अब खुलेआम चर्चा है— "यह बेचैनी आम आदमी के एंबुलेंस और किसान की ट्रैक्टर-ट्रॉली के लिए नहीं, बल्कि खुद की चमचमाती गाड़ियों के लिए है।"
कड़वा सवाल: अगर यही सक्रियता 5 साल पहले दिखाई गई होती, तो क्या आज 2 करोड़ की आबादी एक पुराने पुल की मरम्मत की मोहताज होती?
फाइलों में कैद 300 करोड़ का समाधान
घाघरा जैसी उफनती नदी पर रेलवे ने तीन-तीन पुल खड़े कर दिए, लेकिन सड़क परिवहन के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था तक नहीं बन पाई। 300 करोड़ रुपये के फोरलेन पुल का प्रस्ताव दिल्ली के दफ्तरों में महीनों से रद्दी की तरह पड़ा है।
क्या केंद्र सरकार को पूर्वांचल की यह लाइफलाइन नहीं दिखती?
क्या राज्य सरकार के पास इतने बड़े संकट का कोई ठोस 'प्लान-बी' नहीं था?
ठहर जाएगी जिंदगी, कौन लेगा जिम्मेदारी?
अगर यह पुल दो महीने के लिए बंद होता है, तो इसका असर केवल दूरी बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा:
मरीज: एंबुलेंस को घंटों का फेर लगाना पड़ेगा, जिससे मौत का रिस्क बढ़ेगा।
छात्र: राजधानी की ओर जाने वाले छात्रों का भविष्य अधर में लटकेगा।
व्यापारी व किसान: माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और मंडियां ठप होंगी।
यह सिर्फ एक पुल की मरम्मत नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम का 'करप्शन और लेटलतीफी' वाला आईना है। संकट आने पर दौड़ लगाना समाधान नहीं, बल्कि अपनी नाकामियों पर पर्दा डालना है। जनता अब पूछ रही है कि क्या वह हमेशा नीति-निर्माताओं की प्राथमिकताओं की लिस्ट में सबसे नीचे ही रहेगी? क्या जिम्मेदारों की नींद तब खुलेगी जब व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ देगी?
गोण्डा से ब्यूरो रिपोर्ट शिव शरण
