
प्रयागराज: जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर विकासखंड होलागढ़ का गांव बदलीपुर। इस गांव की एक बड़ी खासियत है जो शायद कहीं और नहीं मिलेगी। लगभग 200 घरों की बसावट वाले बदलीपुर गांव में 90 प्रतिशत पुरुषों के हाथ में मिठाई और अन्य खाद्य सामग्री बनाने की बेहतरीन कला है। कारीगरी भी ऐसी कि जिसका लोहा पूरा जिला मानता है।
लगन के दिनों में गांव हो जाता है खाली, सब चले जाते हैं बुकिंग पर आप प्रयागराज शहर के किसी भी नामी मिष्ठान विक्रेता और कैटरर के कारखाने की
बात करें तो कहीं न कहीं उससे बदलीपुर का नाम जरूर जुड़ा होगा। लगन के
दिनों में गांव लगभग खाली रहता है। ज्यादातर पुरुष और महिलाएं भी शादी
समारोहों में बुकिंग पर चले जाते हैं और लगन खत्म होने के बाद ही वापस आते
हैं। यादव और पाल बिरादरी बाहुल्य इस गांव की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर अकबर
है। यहां के युवाओं और 40 की उम्र पार कर चुके लोगों को मिष्ठान कारीगरी
पुरखों से विरासत में मिली है।
यहां रोजगार की नहीं कमी, सभी युवा सीखते हैं कारीगरी
मिठाई तैयार करने समेत हलवाई पेशे के तहत आने वाले सभी काम में यह माहिर
हैं। रामआसरे यादव, ललित यादव, घनश्याम यादव, उमेश यादव, कन्हैया यादव,
रामलौटन पाल, राकेश यादव और दर्जनों अन्य ग्रामीणों के पास रोजगार की कोई
कमी नहीं। उमेश यादव कहते हैं कि उन्होंने हलवाई की कला अपने पिता अमरनाथ
यादव से सीखी है और अमरनाथ यादव जो अब 60 की अवस्था से अधिक के हो चुके हैं
उन्होंने 15 साल की उम्र में रामभवन चौराहा स्थित सुलाकी यादव के मिष्ठान
कारखाने में काम सीखा और वहीं से इस कला में पारंगत हुए।
शहर की ज्यादातर दुकानों में बदलीपुर के मिठाई कारीगर
घनश्याम यादव कहते हैं कि करीब 30 साल से हलवाई का काम कर रहे हैं, घर में लोग पहले यह काम करते थे उन्हीं से पाक कला का प्रशिक्षण लिया और अब स्वयं काम कर रहे हैं। शहर में अल्लापुर, सिविल लाइंस, अशोक नगर, बाबा चौराहा, नैनी और जीरो रोड पर मिठाई के कुछ नामी विक्रेताओं के कारखाने में बदलीपुर के कारीगर अब भी काम कर रहे हैं और उनके हाथ से बनने वाली गुणवत्तापूर्ण मिठाई ने विक्रेताओं का नाम भी रोशन किया है। ग्राम प्रधान मोहम्मद अजीम कहते हैं कि उनकी ग्राम पंचायत का यह गांव वाकई कुछ अलग पहचान रखता है। कहते हैं कि बदलीपुर में लगभग हर घर में कारीगर रहते हैं। इन्हें न काम की कमी है न किसी को बेरोजगारी का रोना है। कहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी ही नहीं, पूर्वज भी इसी तरह से मिष्ठान व अन्य खाद्य सामग्री बनाने के लिए शादी विवाह वाले घरों में जाते रहे हैं,
