उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम आए 9 दिन बीत गए हैं। प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। शुक्रवार को होली के दिन सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओपी राजभर ने गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। करीब एक घंटे चली मुलाकात में केंद्रीय मंत्री और यूपी चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान, भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल भी मौजूद रहे।
राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो ओपी राजभर भी आगामी 25 मार्च को भाजपा मंत्रिमंडल की शपथ लेंगे। इस मुलाकात के तीन दिन पहले भी ओपी राजभर ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की थी। फिलहाल इस मुलाकात के बाद सियासी गलियारे में अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं।

ओपी राजभर ने भाजपा के सामने रखी अपनी बात
बता
दें कि विधानसभा चुनाव 2022 में सुभासपा और सपा ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा
था। सूत्र यह बताते हैं कि अमित शाह के सामने राजभर ने अपनी मांग के साथ
अपना पक्ष रखा। इसके बाद आगे का फैसला अमित शाह और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व
को करना है। माना यह भी जा रहा है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है।
क्योंकि पूर्वांचल क्षेत्र की लोकसभा की करीब 26 सीटें ऐसी हैं जहां राजभर
समाज का प्रभाव है। इन सीटों पर 50 हजार से लेकर 250 तक वोट बैंक हैं। 14
लोकसभा सीटें तो ऐसी हैं जहां पर राजभर समाज का वोट नतीजों पर निर्णायक
रहता है। यह माना जा रहा है कि भाजपा के 2024 लोकसभा चुनाव के लिए
पूर्वांचल में मददगार साबित हो सकते हैं।
बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में राजभर ने भाजपा के साथ रहकर विधानसभा का चुनाव लड़ा था। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़कर 6 विधान सभा सीटें जीती हैं। हालांकि उनके बेटे चुनाव हार गए।
सपा-बसपा गठबंधन के बाद बीजेपी के लिए जरूरी था सुभासपा से गठजोड़
अंतत:
भाजपा ने आयोगों और निगमों में सुभासपा के कार्यकर्ताओं को समायोजित कर
2019 में सहर्ष साथ लेने के लिए कदम बढ़ाए। अपनी इसी ताकत के साथ ही हर
जिले में सम्मेलन कर कुछ अन्य छोटी जातियों को लामबंद करने की ताकत के चलते
ओपी राजभर पर अन्य सियासी दल- जैसे सपा और कांग्रेस डोरे डालते रहे। इसी
अहमियत के चलते ओपी राजभर लगातार भाजपा पर दबाव बनाते रहे। भाजपा भी उनसे
दूरी बनाने का साहस नहीं कर सकी। अब भाजपा और सुभासपा पूर्वांचल में एक बार
फिर विरोधियों को चुनौती दें तो हैरत नहीं। ओपी राजभर ने साल 2002 में
सुभासपा की स्थापना की थी। सुभासपा ने 2002 विधानसभा, 2004 लोकसभा, 2007
विधानसभा, 2009 लोकसभा और 2012 विधानसभा चुनाव लड़े।
पूर्वांचल में राजभर वोटर काफी अहम
बता
दें कि पूर्वांचल के कई जिलों में राजभर समुदाय का वोट राजनीतिक समीकरण
बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के
राष्ट्रीय अध्यक्ष ओपी राजभर का यूपी के पूर्वांचल क्षेत्र की राजनीति में
दबदबा है। 2022 के चुनाव में जहां एक तरफ भाजपा पश्चिम से लेकर अवध तक
मजबूत नजर आई।
वहीं, पूर्वांचल के चार जिलों में भाजपा का खाता तक नहीं
खुला। गाजीपुर, अम्बेडकरनगर, मऊ, बलिया, जौनपुर, आजमगढ़ में भाजपा को सबसे
ज्यादा नुकसान हुआ। इसके बाद भाजपा अभी से लोकसभा चुनाव को लेकर जुट गई है।
भाजपा भी चाहती है कि ओपी राजभर उनके साथ आ जाएं। यूपी में राजभर समुदाय
की आबादी करीब 3 फीसदी है, लेकिन पूर्वांचल के जिलों में राजभर मतदाताओं की
संख्या 12 से 22 फीसदी है। गाजीपुर, चंदौली, मऊ, बलिया, देवरिया, आजमगढ़,
लालगंज, अंबेडकरनगर, मछलीशहर, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही में
इनकी अच्छी खासी आबादी है, जो सूबे की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटों पर
असर रखते है। इसका असर 2022 के चुनाव में दिखाई भी पड़ा।
साल 2009 के आम चुनावों में अकेले दम हासिल किए थे अच्छे खासे वोट
सुभासपा
ने साल 2014 में मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल व दो-तीन अन्य छोटे दलों
के साथ समझौता किया। इन चुनावों में सुभासपा गठबंधन के प्रत्याशियों को 19
लोकसभा सीटों पर 25 हजार से 1.5 लाख के बीच वोट मिले थे। सुभासपा ने साल
2009 के आम चुनावों में अकेले दम पर ही अच्छे वोट बटोरे थे। साल 2009 के
लोकसभा चुनावों में चंदौली में सुभासपा को 1.03 लाख वोट, बलिया में सुभासपा
को 75 हजार वोट, सलेमपुर में सुभासपा को 65 हजार वोट, घोसी में सुभासपा को
75 हजार वोट, वाराणसी में सुभासपा को 40 हजार वोट और बस्ती में सुभासपा को
करीब 45 हजार वोट मिले थे।
15 सालों तक संघर्ष के बाद 2017 में सुभासपा ने किया था एलायंस
करीब
15 सालों तक संघर्ष के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में ओपी राजभर भाजपा
जैसी बड़ी पार्टी से समझौता करने का मौका मिला था। अगर कहें कि भाजपा का
शीर्ष नेतृत्व पिछले चुनावों में उन्हें मिलने वाले वोटों की ताकत देख
उन्हें साथ लेने का कूटनीतिक फैसला लेने पर मजूबर हुआ, तो गलत न होगा।
जुलाई 2016 में विधानसभा चुनावों से पहले अमित शाह ने मऊ के रेलवे मैदान में उनके साथ रैली कर उन्हें साथ लेने की घोषणा कर पूर्वांचल में बड़ा दाव खेला था। इसका असर भी हुआ। सुभासपा के चार विधायक चुने गए थे। इसके बावजूद अपनी पार्टी और कैडर को उन्होंने शांत नहीं बैठने दिया। राज्य मंत्रिमंडल में वाजिब हिस्सेदारी न मिलने से नाराज ओम प्रकाश न केवल भाजपा को आड़े हाथों लेते रहे, बल्कि सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे और एक साल के बाद भाजपा से अलग हो गए थे।

