राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय: एआई से नहीं, एजीआई से बढ़ेगा सबसे बड़ा खतरा : बालेंदु शर्मा दाधीच
राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला में कृत्रिम मेधा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ गंभीर मंथन
पाठ्यक्रमों में कृत्रिम मेधा का समावेश समय की आवश्यकता - प्रोफेसर सत्यकाम
प्रकाशनार्थ
प्रयागराज, 1 अगस्त 2026। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के अटल प्रेक्षागृह में भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन
की 144वीं जयंती के अवसर पर शनिवार को 19वीं राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला का भव्य आयोजन किया गया। इस वर्ष व्याख्यानमाला का विषय कृत्रिम मेधा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा रखा गया, जिस पर देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, तकनीकी विशेषज्ञों एवं चिंतकों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम में कृत्रिम मेधा की वर्तमान उपयोगिता, भविष्य की चुनौतियों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता, देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, तकनीकी विशेषज्ञ तथा टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहा कि आने वाला समय केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस का होगा और वास्तविक चुनौती भी वहीं से उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा कि मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा एआई से नहीं, बल्कि एजीआई से बढ़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान एआई मनुष्य के निर्देशों के अनुरूप कार्य करने वाला एक शक्तिशाली उपकरण है, किंतु जब एजीआई मनुष्य की तरह स्वतंत्र रूप से सोचने, निर्णय लेने और स्वयं सीखने की क्षमता प्राप्त कर लेगा, तब उसके सामाजिक, नैतिक और वैश्विक प्रभाव अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जब तक कृत्रिम मेधा का उपयोग मनुष्य एक तकनीकी उपकरण के रूप में करता है, तब तक यह नई संभावनाओं, नवाचार और विकास के असीम अवसर प्रदान करती है किंतु यदि तकनीक मानव मूल्यों से विमुख हो गई तो वही मानवता के लिए चुनौती बन सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मस्तिष्क एक जैविक प्रणाली है, जिसमें संवेदना, करुणा, नैतिकता और सृजनात्मकता का समावेश है, जबकि कंप्यूटर केवल एल्गोरिद्म और आँकड़ों के आधार पर कार्य करता है। इसलिए भविष्य की पीढ़ी को केवल तकनीकी दक्षता ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, रचनात्मक चिंतन और नैतिक मूल्यों को भी समान महत्व देना होगा।
बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ज्ञान का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन को संतुलित और मूल्यनिष्ठ बनाने वाली परंपरा है। हमारे शास्त्र विज्ञान और आध्यात्म, तर्क और आस्था, ज्ञान और आचरण के अद्भुत समन्वय का संदेश देते हैं। यदि आधुनिक तकनीक का विकास भारतीय ज्ञान परंपरा के नैतिक मूल्यों, संस्कारों और मानवीय दृष्टि के साथ किया जाए तो कृत्रिम मेधा मानव कल्याण, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण का अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे तकनीक के उपभोक्ता मात्र न बनें, बल्कि उसके सृजनकर्ता और उत्तरदायी उपयोगकर्ता बनें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सत्यकाम ने कहा कि आज आवश्यकता कृत्रिम मेधा से भयभीत होने की नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझने और विवेकपूर्ण ढंग से अपनाने की है। उन्होंने कहा कि हमें अज्ञान और भय दोनों से मुक्त होना होगा।तकनीक का विरोध समाधान नहीं है; बल्कि उसके स्वरूप, सीमाओं और संभावनाओं को समझते हुए उसका उपयोग राष्ट्रहित में करना ही समय की मांग है। कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि उन्हें कृत्रिम मेधा का वैज्ञानिक प्रशिक्षण, नैतिक दृष्टि और भारतीय ज्ञान परंपरा का बोध एक साथ दिया जाए, तो वे भारत को तकनीकी नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में कृत्रिम मेधा का समावेश अब एक विकल्प नहीं, बल्कि समय की आवश्यकता बन चुका है। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षकों की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि उत्तम चरित्र निर्माण, मूल्यपरक शिक्षा और तकनीक के नैतिक उपयोग की प्रेरणा देने में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।प्रो. सत्यकाम ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए युवाओं से देश की ऐतिहासिक धरोहरों, प्राचीन विश्वविद्यालयों, मंदिरों, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता का वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वास्तु ज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान और जीवन-दर्शन आज भी विश्व के लिए प्रेरणास्रोत हैं। तकनीकी विकास तभी सार्थक होगा जब वह मानवता, नैतिकता और राष्ट्रहित से जुड़ा होगा। उन्होंने उपस्थित सभी शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को नशा-मुक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी दिलाया तथा कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि स्वस्थ, जागरूक और संस्कारित समाज से संभव है।
विशिष्ट वक्ता एवं उत्तर मध्य रेलवे, प्रयागराज के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने कहा कि किसी भी तकनीक अथवा राष्ट्रीय योजना की सफलता समाज के प्रत्येक नागरिक की सक्रिय सहभागिता, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा का उपयोग जनसुविधाओं, सुशासन, पारदर्शिता, संचार व्यवस्था तथा सार्वजनिक सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि एआई का उपयोग सकारात्मक दृष्टि और मानवीय संवेदनाओं के साथ किया जाए तो यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अतिथि वक्ता एवं पूर्व डीआईजी कृपा शंकर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि कृत्रिम मेधा को केवल नकल या स्वचालित कार्यों तक सीमित नहीं समझना चाहिए। इसे अनुसंधान, नवाचार, विश्लेषण और ज्ञान-विस्तार के प्रभावी साधन के रूप में अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई ने जटिल सूचनाओं और विशाल आंकड़ों का विश्लेषण सरल बना दिया है, जिससे शोध और निर्णय प्रक्रिया अधिक प्रभावी हुई है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे तकनीक का उपयोग सामाजिक समस्याओं के समाधान और नवाचार के लिए करें।
कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. पी.के. पाण्डेय ने विषय-प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि कृत्रिम मेधा शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल नई तकनीकों से परिचित कराना नहीं, बल्कि उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों से जोड़ते हुए जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. त्रिविक्रम तिवारी ने किया। अतिथियों का स्वागत प्रो. मीरा पाल ने तथा प्रो. आनन्दा नंद त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के निदेशकगण, आचार्य, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी एवं प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र
जनसंपर्क अधिकारी
