गोंडा। गरीब, पिछड़े और ग्रामीण अंचल के छात्रों को सस्ती उच्च शिक्षा देने के उद्देश्य से स्थापित मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय बलरामपुर आज गरीब छात्रों के लिए ही सबसे बड़ा आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा शुल्क के नाम पर 1710 रुपये वसूलना न केवल अन्य राज्य विश्वविद्यालयों की तुलना में अधिक है, बल्कि यह सीधे तौर पर गरीब और किसान परिवारों के साथ अन्याय भी है। जहां डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या जैसे प्रतिष्ठित राज्य विश्वविद्यालय में प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा शुल्क मात्र 1210 रुपये है, वहीं मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय में 500 रुपये से अधिक अतिरिक्त शुल्क वसूला जाना विश्वविद्यालय प्रशासन की संवेदनहीनता और मनमानी को उजागर करता है। सवाल यह है कि नया और सीमित संसाधनों वाला विश्वविद्यालय पुराने विश्वविद्यालय से अधिक शुल्क किस आधार पर ले रहा है? बलरामपुर और गोंडा जैसे जिले पहले से ही बेरोजगारी, महंगाई और कृषि संकट की मार झेल रहे हैं। ऐसे में गरीब किसानों, मजदूरों और दिहाड़ी पर काम करने वाले परिवारों के बच्चों से हजारों रुपये की परीक्षा शुल्क वसूलना शिक्षा नहीं, बल्कि शोषण की श्रेणी में आता है।
स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि बड़ी संख्या में छात्र–छात्राएं परीक्षा फॉर्म भरने से मजबूरन पीछे हट रहे हैं। कई छात्रों का कहना है कि या तो घर चलाएं या परीक्षा दें,दोनों एक साथ संभव नहीं है। यह हालात शिक्षा के अधिकार कानून और सामाजिक न्याय की अवधारणा का खुला उल्लंघन हैं। छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप लगाया है कि वह सरकार की मंशा के विपरीत काम कर रहा है और गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा से बाहर धकेलने की नीति अपना रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब तक न तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई स्पष्ट जवाब दिया है और न ही जिला प्रशासन या उच्च शिक्षा विभाग ने इस गंभीर मुद्दे पर हस्तक्षेप किया है। यदि शीघ्र ही परीक्षा शुल्क को घटाकर अन्य राज्य विश्वविद्यालयों के बराबर नहीं किया गया,तो छात्र आंदोलन और जनआक्रोश तेज होना तय है।
