जातियों के गणित में उलझा है फूलपुर का समीकरण, मतदाताओं के मन की थाह लेना चुनौतीपूर्ण
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जातियों के गणित में उलझा है फूलपुर का समीकरण, मतदाताओं के मन की थाह लेना चुनौतीपूर्ण

 


चुनावी बिसात किसी चक्रव्यूह से कम नहीं है। ऐसा चक्रव्यूह , जिसका आकार प्रकार, रंग रूप पल-पल बदलता है। यह इम्तिहान आसान नहीं है। पांच माह के बाद ऐसा ही एक चक्रव्यूह प्रयागराज की फूलपुर विधानसभा में तैयार है। फूलपुर के चुनावी दंगल में भाजपा के दीपक पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर है। अखाड़े में सपा ने मुजतबा सिद्दीकी के रूप में एक अनुभवी सियासी पहलवान को उनके सामने उतारा है जो पूर्व में तीन बार विधायक रह चुके हैं। हालांकि इस पूरी विधानसभा में जातियों के गणित में समीकरण उलझा नजर आ रहा है। इसी वजह से वोटर यह मानकर कर चल रहे हैं कि उपचुनाव में भाजपा, सपा या बसपा किसी के लिए भी राह उतनी आसान नहीं है। फूलपुर सीट पर भाजपा जहां केंद्र और प्रदेश सरकार की विकास योजनाओं को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, तो वहीं इंडिया गठबंधन के नेता केंद्र व प्रदेश सरकार की विफलताओं के साथ ही पिछड़ा ,दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) को बड़ा मुद्दा मानकर चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। इस पूरे विधानसभा में जातीय समीकरण साधने में ही राजनीतिक दल जुटे हुए हैं। चार लाख से ज्यादा वोटरों वाली इस विधानसभा में 70 हजार से ज्यादा कुर्मी वोटर हैं।

कुर्मी और यादव वोट हैं निर्णायक

कहा जाता है कि यहां कुर्मी और यादव ही निर्णायक वोटर माने जाते हैं। हालांकि जमनीपुर के धनंजय कुमार मिश्रा और सत्यवान पांडेय इसे एक सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि उपचुनाव कुल मिलाकर सत्ता पक्ष का ही होता है। कुछ मुद्दे जरूर हैं जिसे देखकर लोग अपने मत का प्रयोग करेंगे। अमरेश त्रिपाठी रुद्रा और सुरेंद्र कुमार ने कहा कि लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा उपचुनाव के दौरान माहौल बदला हुआ है। सीएम योगी की कोटवा में हुई सभा के बाद उपचुनाव का रंग अब दिखने लगा है।

मतदाताओं ने गिनाईं क्षेत्र की समस्याएं

कनिहार के रफीक ने कहा कि कछारी क्षेत्र में बांध का निर्माण जरूरी है। चंद्रदेव त्रिपाठी ने कहा कि इस चुनाव से न सरकार बननी है और न ही गिरनी है। फिर भी नींवी, छवैया, दुबावल आदि क्षेत्र ऐसे हैं जहां हर वर्ष बाढ़ लंबा नुकसान पहुंचाती है। इस ओर सरकार ध्यान दें। बाबा ( सीएम योगी) से उम्मीद है कि वह आवारा जानवरों से हम ग्रामीणों को निजात दिलाएंगे। उधर हनुमानगंज बाजार में धर्मेंद्र जायसवाल, मंटू केसरवानी, जीतू सोनी, चंचल द्विवेदी, रमेश आदि युवाओं ने कहा कि सीएम के आने के बाद चुनावी माहौल बना है।

14 नवंबर को आ रहे हैं अखिलेश

अब 14 को अखिलेश यादव भी आ रहे हैं। सरकार यहां विकास कार्य तो कर रही है लेकिन व्यापारियों का ध्यान नहीं रखा जा रहा। यहां दुकानों के आगे रेलिंग लगा देने के बाद हम सभी का कारोबार प्रभावित हो सकता है। इसी तरह जलालपुर के विक्रम पटेल, शिवम पटेल और अनिकेत मौर्य ने कहा कि सरकारी भर्तियों को लेकर हम लोग संतुष्ट नहीं है। इसी वजह रही कि लोकसभा चुनाव का परिणाम सत्ता दल के पक्ष में उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा।

इसी तरह इफको के निकट देवनगरी गांव के अशफाक उल्ला, शुभम उपाध्याय, मुलायम, देवराज उपाध्याय ने बताया कि लोकसभा चुनाव में फूलपुर विधानसभा से सपा ने बड़ी लीड हासिल की थी। इस बार भी उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है। इसी तरह मोहनगंज बाजार के दिलीप पासी ने कहा कि हर चुनाव में नेता आते हैं, बड़े वादे करते हैं, उसके बाद कोई यहां दोबारा झांकने नहीं आता। सहसों और अंदावा के राम जी केसरवानी और दीपू जायसवाल ने कहा कि यह बात सही है कि बीते दस वर्ष में विकास कार्य काफी हुए हैं। कहा कि रिंगरोड सरकार बनवा रही है। इससे काफी हद तक लोगों को जाम की समस्या से निजात मिलेगी।


ध्रुवीकरण पर टिकीं भाजपा की उम्मीदें


फूलपुर विधानसभा के रण में प्रत्याशियों के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। बदले माहौल में भाजपा प्रत्याशी दीपक पटेल के सामने जीत हासिल करने की चुनौती है। पर उनकी राहें आसान नहीं हैं। भाजपा की उम्मीदें ध्रुवीकरण पर टिकी हुई हैं। 2017 एवं 2022 में भाजपा यह सीट जीत चुकी है। इस बार पार्टी की निगाहें हैट्रिक पर है। हालांकि लोकसभा चुनाव में सपा ने यहां बड़ी लीड हासिल कर हर किसी को चौंका दिया। उसे लेकर उपचुनाव में सपा नेता एवं कार्यकर्ता खासे उत्साहित हैं। सपा ने इस सीट से मुस्लिम प्रत्याशी को उतारा है। इस वजह से भाजपा का पूरा फोकस सर्वण, कुर्मी, मौर्य, दलित, कुशवाहा आदि बिरादरी के वोटरों पर है। वहीं सपा के परंपरागत वोटरों के कारण गठबंधन प्रत्याशी अपना समीकरण मजबूत मानकर चल रहे हैं। हालांकि बसपा भी यहां छुपा रुस्तम साबित हो सकती है। भाजपा और सपा दोनों ही दल बसपा को हल्के में बिल्कुल भी नहीं ले रहे हैं।


निर्णायक भूमिका में हैं ओबीसी


फूलपुर सीट के सियासी समीकरण को अगर देखें तो यहां कुल 4.07 लाख मतदाता है। इसमें 2.23 लाख पुरुष एवं 1.83 लाख महिला मतदाता है। थर्ड जेंडर के 58 मतदाता भी अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। जातीय समीकरण की अगर बात करें तो इस सीट पर ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका में है। खास तौर पर पटेल और यादव मतदाता इस सीट पर जीत हार तय करते हैं। वहीं इस सीट पर मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकता है। अगर दलित वोटर भी इधर उधर खिसके तो भाजपा को यहां बड़ी चुनौती मिल सकती है। वहीं बसपा से जितेंद्र कुमार सिंह ताल ठोंक रहे हैं। हालांकि बसपा द्वारा पूर्व में घोषित प्रत्याशी शिव बरन पासी का टिकट काटकर जितेंद्र कुमार सिंह को टिकट दिए जाने से दलित वर्ग की नाराजगी का इस सीट पर खासा प्रचार भी किया जा रहा है।


2723 वोटों के अंतर से हारे थे मुजतबा


वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी मुजतबा फूलपुर से चुनाव लड़े थे। तब उन्होंने भाजपा प्रत्याशी प्रवीण पटेल को कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि उन्हें महज 2723 वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि मुजतबा पूर्व में तीन बार विधायक रह चुके हैं लेकिन तीनों ही बार वह बसपा से चुनाव जीते थे। वहीं भाजपा के दीपक पटेल फूलपुर की पूर्व सांसद केसरी देवी पटेल के पुत्र होने के साथ पूर्व विधायक भी रह चुके हैं। दीपक पटेल 2012 में करछना विधानसभा सीट से बसपा के विधायक रह चुके हैं।


वोट कटवा हो सकते हैं छोटे राजनीतिक दल


फूलपुर विधानसभा में छोटे राजनीतिक दल भी वोट कटवा साबित हो सकते हैं। इस सीट पर चंद्रशेखर आजाद रावण की आजाद समाज पार्टी ने भी मुस्लिम प्रत्याशी शाहिद अख्तर खान को चुनाव मैदान में उतारा है। कुछ अन्य प्रत्याशी भी है जो भाजपा और सपा के प्रत्याशियों की टेंशन बढ़ा सकते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कम अंतर की जीत को देखते हुए छोटे राजनीतिक दलों के प्रत्याशी भी प्रत्याशियों की जीत हार में बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं।


वोटों का गणित


कुर्मी - 70 हजार


यादव - 65 हजार


मुस्लिम - 50 हजार


दलित - 80 हजार


ब्राहमण - 35 हजार


ठाकुर - 20 हजार


बिंद, कुशवाहा, मौर्य - 45 हजार


अन्य - 40 हजार



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