
प्रयागराज, देश के पांच राज्यों की सत्ता
पर बैठने वालों का निर्णय हो चुका है। पंजाब में नई सरकार ने काम शुरू कर
दिया है। चंद दिनों बाद चार राज्यों की सत्ता पर नई सरकार काबिज हो जाएगी।
इसके बाद आकाशीय सत्ता में व्यापक उलटफेर होगा। दो अप्रैल से 'राक्षस' नामक
नवसंवत्सर शुरू होगा। इसमें सत्ता की चाबी न्याय के देवता शनि ग्रह के हाथ
रहेगी, जबकि मंत्री की जिम्मेदारी विद्या-ज्ञान के प्रदाता गुरु ग्रह
निभाएंगे। इस बदलाव को ज्योतिर्विद राष्ट्र के लिए कल्याणकारी मान रहे हैं।
आकाशीय सत्ता का परिवर्तन पृथ्वी को रोग-शोक से मुक्त करेगा। धर्म पर
आस्था रखने वालों के लिए आने वाला समय कल्याणकारी माना जा रहा है। इसके साथ
कहीं सूखा पडऩे व कहीं अधिक बारिश होने की संभावना है।
अन्यायी, अधर्मी लोगों का प्रभाव कम होगा : आचार्य देवेंद्र
श्रीधर्मज्ञानोपदेश संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य आचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी बताते हैं कि चैत्र शुक्लपक्ष की प्रतिप्रदा से नवसंवत्सर का आरंभ होगा। राक्षस नामक संवत्सर के राजा के साथ शनि के पास वित्त व जल का प्रभार भी रहेगा। इससे अन्यायी, अधर्मी लोगों का प्रभाव कम होगा। वहीं, धन की सार्थक दृष्टि से व्यय होगा। गुरु के मंत्री होने से शिक्षा व वैज्ञानिक दृष्टि से भारत का प्रभाव बढ़ेगा। इसके अलावा रस का प्रभार मंगल, धान्य (अनाज) का प्रभार शुक्र, किला, फसल का प्रभार सूर्य, फल व मेघ का प्रभार बुध के पास रहेगा। वहीं, राहु-केतु व चंद्रमा को कोई प्रभार नहीं दिया गया है। ऐसे में कोरोना संक्रमण से लोगों को पूरी तरह से मुक्ति मिल सकती है। भारत की सैन्य शक्ति का विकास होगा। प्राकृतिक आपदा, भूकंप की संभावना बनी रहेगी। पराशर ज्योतिष संस्थान के निदेशक आचार्य विद्याकांत पांडेय बताते हैं कि विक्रमी संवत का संबंध किसी धर्म से नहीं बल्कि विश्व की प्रकृति खगोल सिद्धांत, ब्रम्हांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र मास के प्रथम दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की संरचना की थी। इसी कारण चैत्र शुक्लपक्ष की प्रतिप्रदा को नवसंवत्सर का आरंभ होता है। राजा विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले पंचांग का चलन शुरू हुआ। महीनों का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की चाल पर होता है। एक माह को दो भागों कृष्णपक्ष व शुक्लपक्ष में बांटा गया है। दिन का नामकरण आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि और चंद्र से हुआ है। दुनिया के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना व वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी। सनातन धर्मावलंबियों के विवाह, नामकरण सहित समस्त शुभ कार्य इसी के अनुरूप होता है।
