रामबनगमन प्रसंग के साथ राम कथा की सातवें दिन हुई शुरुआत
Type Here to Get Search Results !

Advertisement

Acrc institute Acrc instituteAcrc institute

Recent Tube

रामबनगमन प्रसंग के साथ राम कथा की सातवें दिन हुई शुरुआत



पवित्र भूमि अयोध्या में आयोजित श्री राम कथा के सातवें दिन महामंडलेश्वर स्वामी आशुतोष आनंद गिरि जी महाराज ने कथा की शुरुआत प्रभु श्री राम के वन गमन प्रसंग से की। उन्होंने वन गमन के संबंध में कई महत्वपूर्ण प्रसंगो का उल्लेख किया। स्वामी जी के कथा में कथा का रस तो आता ही है बल्कि श्रोताओं को गहरे चिंतन की दशा में लेकर जाते हैं। एक प्रसंग के समानांतर कई प्रसंगों का उल्लेख श्रोताओं के हृदय पर अमिट छाप छोड़ता है। इसका कारण यह है कि स्वामी जी न्याय वेदांत के प्रकांड विद्वान है।बाल्य काल से ही उनका लगाव भक्ति की ओर अधिक था। सच्चे ज्ञान की तलाश में स्वामी जी घर परिवार और भौतिक सुख सुविधा को त्याग कर स्वामी रामबालक दास जी के सानिध्य में संत सेवा और योग साधना में लग गए। ऋते ज्ञानान्न मुक्ति: जैसे श्रुति वचन को आत्मसात कर अनंत ज्ञान की खोज में निकल पड़े। ज्ञान की खोज के सफर में हरिद्वार में स्वामी भरतानंद जी महाराज से लघु सिद्धांत कौमुदी, तर्क संग्रह एवं सांख्य दर्शन का अध्ययन किया। इसके पश्चात उच्च शिक्षा के लिए काशी आ गए। कैलाश मठ काशी में 14 सल तक उन्होंने व्याकरण एवं वेदांत का गहरा अध्ययन किया। अध्ययन क्रम में उन्होंने कई बर शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। उन्होंने एक बर पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त किया। कोलकाता के स्वामी विवेकानन्द विश्वाविद्यालय में वे असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। संयास की ओर लगाव होने के कारण मार्च 2014 में शिवरात्रि के दिन उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और एक नए जीवन में उनका प्रवेश हुआ। उन्होंने वन गमन प्रसंग के माध्यम से पुत्र और माता का प्रेम, भाई भाई का प्रेम, पति और पत्नी का प्रेम,पिता और पुत्र का प्रेम तथा एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम संबंध को दर्शाया। उन्होंने पुत्र और माता के प्रेम संबंध को दर्शाते हुए प्रभु श्री राम का माता कैकई का पैर छूना और उनसे आशीर्वाद लेकर विदा होने जैसे दृश्यों की और श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट किया। स्वामी जी ने कहा माता चाहे जिस परिस्थिति में हो वह कभी कुमाता नहीं हो सकती है। वह जैसी है उसे स्वीकार करो। वह हमेशा से वंदनीय रही है। उन्होंने पिता और पुत्र के संबंधों को लेकर कहा कि पिता की आज्ञा की अवहेलना मत करो। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य कर ही महान बना जा सकता है। भाई और भाई के प्रेम को लेकर उन्होंने कहा की इस सदी में शांति की स्थापना के लिए भाई भाई के बीच आपस में प्रेम होना आवश्यक है। एक पति और पत्नी का संबंध तो शुरू से ही एक पवित्र संबंध रहा है। वनगमन जैसे प्रसंगओं की वजह से कथा आज भावुकता के चरम स्तर पर पहुंच गई । श्रोताओं ने भी इस प्रसंग में साथ दिया।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad

Hollywood Movies