
प्रयागराज: नियम को ताक पर रखकर अवर अभियंता (जेई) के पद पर प्रोन्नति पाने वाले लिपिकों पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है। मामला पकड़ में आने पर अब शासन ने खामी सुधारने और दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश जारी किया है। पीडब्ल्यूडी में अमान्य दस्तावेजों के आधार पर मनमाना तरीके से लिपिकों को जेई बनाने के मामले पर शासन ने रिपोर्ट मांगी है। इस मामले में प्रमुख अभियंता से फाइल तलब कर दी गई है। ऐसे में प्रयागराज समेत अन्य जिलों में प्रोन्नत कर जेई के पदों पर तैनात किए गए अभियंता पदावनत किए जाएंगे। इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार अफसरों को चिह्नित करने की भी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। नौ वर्ष पहले 2013 में सपा सरकार के दौरान 122 लिपिकों को जेई बना दिया गया था। नियम को ताक पर रखकर अवर अभियंता (जेई) के पद पर प्रोन्नति पाने वाले लिपिकों पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है।
मामला पकड़ में आने पर अब शासन ने खामी सुधारने और दोषी अधिकारियों, कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश जारी किया है। इस प्रोन्नति के लिए जारी नियमावली के तहत जेई के 95 फीसदी पदों को आयोग के माध्यम से सीधी भर्ती के ज्रिए भरा जाना था। जबकि, पांच प्रतिशत पदों पर विभाग में नियुक्त समूह ग के लिपिक संवर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति दी जानी थी। लेकिन, पदोन्नति की रेवड़ी आंख मूंद कर बांटी गई। अवर अभियंता के पांच फीसदी पद लिपिकों की पदोन्नति के जरिए भरे जाने थे, लेकिन नियमों को ताक पर रख दिया गया।
डिग्री अमान्य होने के कारण लगा झटकापता चला है कि इसके लिए इंजीनियरिंग का डिप्लोमा करने वाले लिपिकों को पात्र माना गया था। लेकिन, तमाम लिपिकों ने राजस्थान के एक विश्वविद्यालय के अलावा कई निजी संस्थानों से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से दो वर्षीय डिप्लोमा हासिल कर लिया। फिर, इसी डिप्लोमा के आधार पर 122 लिपिकों को जेई बना दिया गया। जबकि, नियुक्ति से पहले डिप्लोमा का सक्षम संवैधानिक संस्था से सत्यापन करवाया जाना चाहिए था। उन दिनों शिकायत के बाद जब इस मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राय मांगी गई, तब यूजीसी ने किसी भी दूरस्थ शिक्षा केंद्र के माध्यम से ली गई इंजीनियरिंग की डिग्री या डिप्लोमा अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजूकेशन (एआईसीटीई) और डिस्टेंस एजुकेशन ब्यूरो (डीईबी) ने भी दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से लिए गए डिप्लोमा अमान्य करार दे दिया था, लेकिन इस मामले में कार्रवाई की बजाए पत्रावली ही दबा दी गई थी। अब नए सिरे से इस मामले की फाइल तलब किए जाने से जिम्मेदार अफसरों के होश उड़ गए हैं।
