पूर्वांचल में चला दो लड़कों का जादू, 27 में से 16 सीट जीतकर किया बड़ा उलटफेर
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पूर्वांचल में चला दो लड़कों का जादू, 27 में से 16 सीट जीतकर किया बड़ा उलटफेर

 


लखनऊ: पिछले दो लोकसभा चुनावों में पूर्वांचल में भाजपा ने अपनी मजबूत दीवार खड़ी की थी, वह अब दरकने लगा है। 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम भी इसकी पुष्टि करता दिख रहा है । 2014 और 2019 में पूर्वांचल क्षेत्र में आने वाले 27 लोकसभा सीटों में से 20 सीटें जीतकर भाजपा नीत एनडीए ने जो एक बड़ी लकीर खींची थीं, उसे इस बार इंडिया ने छोटी कर दिया है। चुनाव परिणाम के लिहाज से देखा जाए तो इंडिया ने इस बार एनडीए से 4 अधिक सीटें जीतकर यह साबित किया है कि दो लड़कों की जोड़ी हिट रही है। पिछले चुनाव में इस क्षेत्र में सिर्फ एक सीट जीतने वाली सपा ने इस बार 15 सीटें जीत कर भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश की है। वहीं, कांग्रेस ने पूर्वांचल क्षेत्र की इलाहाबाद जीत कर इंडिया को मजबूती दी है। पिछली बार की तुलना में इस बार पूर्वांचल में एनडीए को कुल 9 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। चुनाव परिणामों के आधार पर देखें तो दो लड़कों की जोड़ी ने पूर्वांचल की सियासत में बड़ा उलटफेर किया है। आंकड़ों के मुताबिक 2019 में इस क्षेत्र की 27 सीटों में से भाजपा ने 18 और उसकी सहयोगी अपना दल (एस) ने दो सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार इस क्षेत्र में भाजपा को सिर्फ 10 सीट ही मिली हैं। वहीं, अपना दल (एस) के खाते में रही दो में एक ही सीट पर जीत मिली है। राबर्टसगंज सीट पर अपनी दल (एस) की प्रत्याशी रिंकी कोल को हराकर कब्जा कर लिया है। इस सीट पर सपा ने भाजपा के पूर्व सांसद छोटेलाल खरवार को उतारा था।

बताते चलें कि 2019 में सपा को पूर्वांचल में सिर्फ एक सीट आजमगढ़ मिली थी। यहां से अखिलेश यादव चुनाव जीते थे। लेकिन विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी तो उप चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर कब्जा जमा लिया था। लेकिन इस बार के चुनाव में बाजी पलट दी है। ताजा चुनाव परिणाम के मुताबिक सपा ने आजमगढ़ सीट को वापस ही नहीं लिया है, बल्कि 2019 में भाजपा की जीत वाली सात सीटें सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, मछलीशहर, बलिया, बस्ती, संतकबीर नगर और चंदौली सीट के अलावा एनडीए की साझेदार अपना दल (एस) की राबर्टसगंज सीट पर कब्जा जमाने में कामयाब रही है। जबकि भाजपा के कब्जे वाली इलाहाबाद सीट पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया है।

यहीं नहीं, भाजपा के अलावा पूर्वांचल में 6 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बसपा के खाते में रही छ सीटों लालगंज, जौनपुर, गाजीपुर, श्रावस्ती, घोसी और अंबेडकरनगर पर भी कब्जा करने में सफल रही है। इस प्रकार देखा जाए तो पूर्वांचल में भाजपा को जहां 9 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं बसपा का ग्राफ शून्य हो गया है।

मोदी का मार्जिन घटा तो महेन्द्र हारे
पूर्वी यूपी की सबसे हॉट सीट रही वाराणसी के मतदाताओं के रूझान ने भी भाजपा को मायूस किया है। दो लड़कों की जोड़ी ने मोदी-योगी के गढ़ में बड़ा सियासी उलटफेर किया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वाराणसी से तीसरी बार उतरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जीत का मार्जिन पिछले चुनाव की तुलना में जहां आधे से भी कम हुआ है, तो वहीं, चंदौली से हैट्रिक लगाने चंदौली से उतरे कैबिनेट मंत्री महेन्द्र नाथ पांडेय को हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे ही एनडीए के कर्मी चेहरे के तौर पर खुद को पेश करने वाली केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल को भी कड़े संघर्ष के बाद जीत मिली है। जबकि नौवीं बार सांसद बनने की दौड़ में रही मेनका गांधी को भी पराजय का सामना पड़ा है।

भाजपा के शिकस्त के ये हैं प्रमुख कारण
- इस क्षेत्र में जातीय समीकरण के सामने विकास व कल्याणकारी योजनाएं रहीं बेअसर
- संविधान-आरक्षण के मुद्दे से दलित व पिछड़े मतों का बिखराव रोकने में भाजपा असफल रही
- कई सांसदों के खिलाफ बने माहौल के बावजूद उन्हें उतारना भी मंहगा पड़ा
- टिकट वितरण में पार्टी के कॉडर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा

लोकसभा सीट, 2019, 2024
सुल्तानपुर भाजपा सपा
अंबेडकरनगर बसपा सपा
प्रतापगढ़ भाजपा सपा
फूलपुर भाजपा भाजपा
इलाहाबाद भाजपा कांग्रेस
श्रावस्ती बसपा सपा
डुमरियागंज भाजपा भाजपा
बस्ती भाजपा सपा
संतकबीर नगर भाजपा सपा
लालगंज बसपा सपा
आजमगढ़ सपा सपा
जौनपुर बसपा सपा
मछलीशहर भाजपा सपा
भदोही भाजपा भाजपा
महाराजगंज भाजपा भाजपा
गोरखपुर भाजपा भाजपा
कुशीनगर भाजपा भाजपा
देविरया भाजपा भाजपा
बांसगाव भाजपा भाजपा
घोसी बसपा सपा
सलेमपुर भाजपा भाजपा
बलिया भाजपा सपा
गाजीपुर बसपा सपा
चंदौली भाजपा सपा
वाराणसी भाजपा भाजपा
मिर्जापुर अपना दल (एस) अपना दल (एस)
राबर्टसगंज अपना दल (एस) सपा

सफल रहा सपा नया सोशल इंजिनियरिंग
जौनपुर के टीडी कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. प्रशांत त्रिवेदी का मानना है भाजपा के खराब प्रदर्शन की कई वजहें हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं में मायूसी, बाहरी लोगों को चुनाव लड़ाना, विरोध के बावजूद पुराने चेहरों पर दांव लगाने जैसे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण सपा की बदली रणनीत भी है। सपा ने जिस तरह से इस बार यादव और मुस्लिम का सरपस्त होने का टैग को हटाते हुए गैर यादव ओबीसी और दलितों पर अधिक दांव लगाकर नए सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला दिया था, उसका भी असर रहा है। इसके अलावा संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के मुद्दे को हर ओबीसी और दलितों तक पहुंचाने में भी सपा कामयाब रही है। इसका असर चुनाव परिणाम पर दिख रहा है।

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